मिथिलेश्वर के उपन्यास ‘प्रेम ना बाड़ी ऊपजै’ में सामाजिक सरोकार
DOI:
https://doi.org/10.7492/941gqz91Abstract
मिथिलेश्वर के उपन्यासों में विभिन्न प्रकार के संघर्षों का चित्रण मिलता है। उनकी अधिकांश रचनाओं में पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक संघर्ष निरंतर दिखाई देते हैं। संघर्ष मनुष्य को केवल कमजोर नहीं बनाता, बल्कि उसे जीवन की अनेक स्थितियों, भावनाओं और विचारधाराओं से भी परिचित कराता है। मिथिलेश्वर के उपन्यासों में ग्रामीण, कस्बाई और शहरी संस्कृति का यथार्थपरक स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। गद्य की अनेक विधाओं की तरह ‘उपन्यास’ भी भारतेन्दु युग की महत्त्वपूर्ण देन है। भारतीय नवजागरण के इस दौर में कला, ज्ञान और समाज के अछूते तथा अपरिचित क्षेत्रों की खोज और अन्वेषण की जो प्रक्रिया आरंभ हुई, हिंदी उपन्यास उसी प्रक्रिया की स्वाभाविक परिणति के रूप में सामने आया। गद्य की अनेक विधाओं में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपनी तेजस्वी उपस्थिति दर्ज कराई थी, किंतु उपन्यास-विधा की ओर वे अपेक्षित ध्यान नहीं दे सके। फिर भी उनके निबंधों में कथात्मकता के प्रति जो आग्रह दिखाई देता है, उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि उन्हें अधिक समय मिला होता, तो वे उपन्यास-विधा में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते थे।


