''स्‍वातंत्र्योत्तर हिन्‍दी साहित्‍य में राष्‍ट्रीय चेतना : लोकजीवन और मानवीय मूल्‍यों के संदर्भ में अध्‍ययन''

Authors

  • रेनू यादव and  डॉ. गुड्डू कुमार Author

DOI:

https://doi.org/10.7492/81c8fp11

Abstract

 

 

      स्‍वातंत्र्योत्तर हिन्‍दी साहित्‍य में राष्‍ट्रीय चेतना का स्‍वरूप केवल राजनीतिक स्‍वतंत्रता के उत्‍सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह लोकजीवन, मानवीय मूल्‍यों, सांस्‍कृतिक पुनर्निमाण तथा सामाजिक यथार्थ के व्‍यापक संदर्भों में विकसित हुआ। इस काल के साहित्‍यकारों ने यह अनुभव किया कि राष्‍ट्र की वास्‍तविक शक्ति उसकी जनता, उसकी संस्‍कृति और उसके मानवीय संबंधों में निहित होती है। प्रस्‍तुत शोध पत्र में फणीश्‍वरनाथ रेणु तथा धर्मवीर भारती के साहित्‍य के माध्‍यम से राष्‍ट्रीय चेतना का विश्‍लेषण किया गया है। रेणु के साहित्‍य में जहाँ ग्रामीण भारत की जीवंतता, सामाजिक संरचना और जनमानस की वास्‍तविकता के माध्‍यम से राष्‍ट्र का एक जमीनी स्‍वरूप उभरकर सामने आता है, वहीं भारती के साहित्‍य में मानवीय संवेदनाओं, नैतिक संघर्षों और सांस्‍कृतिक मूल्‍यों के माध्‍यम से राष्‍ट्रीय चेतना का एक आत्मिक और दार्शनिक स्‍वरूप दिखाई देता है। इस प्रकार यह शोध पत्र यह स्‍थापित करने का प्रयास करता है कि स्‍वातंत्र्योत्तर हिन्‍दी साहित्‍य में राष्‍ट्रीय चेतना का विकास बहुआयामी है।, जिसमें लोक और मानवीय मूल्‍य दोनों का समान महत्‍व है।

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Published

2011-2025

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Articles