समकालीन आंचलिक उपन्यासों में अभिव्यक्त लोकसंस्कृति

Authors

  • डॉ. पंढरीनाथ शिवदास पाटिल Author

DOI:

https://doi.org/10.7492/2qwkqk36

Abstract

साहित्य मानव समाज की सांस्कृतिक धरोहर है। साहित्य देश के इतिहास साहित्य और संस्कृति का निर्माण करता है। प्रत्येक युग में युगीन आवश्यकताओं के अनुसार साहित्य के नये-नये रूप आकार लेते हैं। पुनरुत्थानोत्तर औद्योगिक क्रांति से विकसित पूँजीवादी व्यवस्था में जीवन की जटिलता को उसके यथार्थ रूप में साप्रेषित करने के लिए उपन्यास एक समुचित संवाहक एवं लोकप्रिय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। उपन्यास मानव जीवन की संपूर्णता को यथावत प्रस्तुत करने में सक्षम है। उपन्यास का काम इसे नये युग के नये मानव की वास्तविकताओं और समस्याओं को प्रस्तुत करना है जो आधुनिक सभ्यता के साथ उत्पन्न हुए हैं। उपन्यासकार के लिए आज कोई पक्ष अछूता नहीं रहा। मानव जीवन के सामाजिक, राजनीतिक आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि सभी पक्ष बहुत खुलकर आज उपन्यासों में आने लगे है। स्वाधीनता के बाद हिंदी उपन्यास साहित्य में अनेक विषयगत एवं रचनागत प्रयोग हुए हैं। उनमें आंचलिक बोध का भी महत्त्वपूर्ण स्थान हैं। 'अंचल' से तात्पर्य ऐसे स्थान और जाति विशेष से है जो आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अपने आप में एक इकाई हो और जिसके जीवन की कुछ निजी विशेषताएँ हों। आचलिक उपन्यास का उद्देश्य इन निजी विशेषताओं का समग्र चित्रण करना रहा है। यह समग्र चित्रण उपन्यासकार लोकजीवन एवं लोकसंस्कृति के परिप्रेक्ष्य में करता है। समकालीन आंचलिक उपन्यास में इसका व्यापक रूप से चित्रण मिलता है।

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2011-2025

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Articles